शुक्रवार, 22 जुलाई 2016

वो औरत


 उसकी दूसरी शादी थी। पहले पति से किसी कारणवश तलाक हो गया था। पढ़ी लिखी समझदार महिला थी। दूसरे पति की पत्नी का देहांत हो गया था किसी बीमारी  की वजह से, उनके दो बेटे हैं -शादी के वक्त एक बेटाबारहवीं एवम दूसरा नौवीं कक्षा में पढ़ते थे। एक नयी जिंदगी की शुरुआत बड़े ही उत्साह से किया उसने। घर का काम ,नौकरी ,सभी की आवश्यकता की पूर्ति उसकी प्राथमिकता थी। अपने पैसे से अपने बेटों को मनचाहा उपहार देती थी ,अपने लिए कुछ नहीं जोड़ा। शुरू में बड़े बेटे ने उसे दिल से स्वीकार नहीं किया था किन्तु बाद में सभी कुछ सामान्य हो गया था। समय को बीतने में समय नहीं लगता। बड़े बेटे की शादी की। सौत की कभी अपने ससुराल वालों से नहीं पटी  थी सो वो अलग रहती थी ,अपने पति और बच्चों के साथ लेकिन इसने अपने ससुराल वालों को पुनः जोड़ा। कुल मिलाकर वो एक सुखी जीवन जीने का सपना साकार करना चाहती थी लेकिन ऐसा नहीं हो सका। बहू के आ जाने के बाद वो सबकी नज़रों को चुभने लगी क्यों ? सबके अपने अपने कारण थे। बहू ने बताया रोटी फूर्ति से नहीं बना पाती हूँ तो मुझे परेशां करती है। बेटे ने बताया की सुबह थोड़ी देर हो जाती है उठने में तो --ये औरत दरवाजा खटखटातीहै ।खाने के लिए बैठते हैं हम तो पूछती है कितनी रोटी खाओगे। पति का कहना था बेवजह झगड़ती है। छोटे बेटे का उससे ज्यादा लगाव था वो अगर सौतेली माँ का पक्ष लेता था तो ऐसा कहा गया कि उसका --उस औरत से गलत सम्बन्ध है। इन सभी कारणों की वजह से आखिरकार सभी घर वालों ने निर्णय लिया की --पापा इस औरत को तलाक दे दे। रो रही थी  तो सिर्फ और सिर्फ वो औरत जिसने शायद दिल से सभी से रिश्ता  जोड़ा था किसी और ने नहीं जो  रिश्ता तोड़ने के लिए लचर दलील का सहारा ले रहे थे। बड़े बेटे और बहू किसी भी शर्त पर उसे अपने घर में जगह देने को तैयार नहीं थे। छोटा गुमसुम था। 
                                                 उस औरत ने बताया कि मेरे पति को मेरे चरित्र पर शंका है --उन्हें लगता है कि --मेरा उनके किसी दोस्त से अवैध सम्बन्ध है। पति से पूछने पर बड़े बेटे ने जबाव दिया कि -ये औरत मेरे पापा के दोस्तों को पैग बनाकर देती है ,सभी के साथ हँसती बोलती है। कुल मिलाकर ये बात सामने आई कि -वे लोग ऐन -केन प्रकारेण उससे छुटकारा पाना चाहते थे. बड़े बेटे के पास इस बात का कोई जवाब नहीं था कि उसके पापा ऐसे लोगों को घर ही  क्यों बुलाते थे जिनके चालचलन का कोई भरोसा नहीं था। जितने दिन आवश्यकता थी , उस औरत की उन लोगों ने उसकी सहायता ले ली। बहू के आने के बाद वो सभी के नज़रों की किरकिरी बन गई। उससे छुटकारा पाने के लिए --बहू -बेटे प्लानिंग कर उसे गुस्सा दिलाते रहे और वो औरत उस के साजिश की शिकार होती रही। एक दिन गुस्से से ससुराल से मायके आ गई। बड़े बेटे और बहू को मौका मिल गया। दुबारा उसे अपने घर में घुसने नहीं दिया। वो औरत रोती रही कि मुझे दुबारा अपना घर नहीं तोडना है --पर कौन सा घर ? किसका घर ? छोटे बेटे का एक बार को दिल पसीजा भी लेकिन अन्य लोगों पर कोई 
प्रभाव नहीं पड़ा। उस औरत के जिंदगी में घटनेवाली इस घटना की जानकारी जब उसके किसी परिचित और उम्रदराज महिला ने सुनी तो उसने अफसोस जताते हुए सिर्फ इतना ही कहा --उसके पति के मित्र मण्डली को देखते ही मैं  समझ गई थी कि --इसने  गलत निर्णय ले लिया है। इसके पास अच्छे अच्छे विधुर के तरफ से रिश्ते आये थे जिसके बच्चे बहुत छोटे थे जो न सिर्फ उसे माँ का दर्जा  देते बल्कि पति भी अहसानमंद होते ---लेकिन उसने किसी की बात नहीं मानी। काश--- की 
वो समय रहते ही ---समय और सम्बन्ध दोनों के नब्ज को पहचान लेती --तो  दुःख के इस भंवर में न डूबती --पर कोई क्या कर सकता है। ..हम सोचते क्या हैं और हो क्या जाता है ---शायद यही जिंदगी है। 





गुरुवार, 9 जून 2016

-
                                      

                                       गला खुश्क पर ---
भागलपुर का रेलवे  स्टेशन ---आज भी वैसा ही है जैसा मेरे बचपन की यादों में बसा हुआ है। वही भीड़ ,वही दृश्य-- आसपास की दुकानें --कोई बदलाव नहीं-- कोई ठहराव नहीं। बस भागे जा रहे हैं लोग और भागी जा रही है जिंदगी। ठहरा हुआ है तो मात्र वो वक्त  -- जो  मेरे उस जगह पहुँचते ही मुझे स्नेहसिक्त आँचल में समेट लेता है शायद यही वजह है की मैं कुछ सुस्त सी हो जाती हूँयहाँ आकर । अन्यथा किसी भी रेलवे स्टेशन पर  मैं बुक स्टाल पर जरूर जाती हूँ पर यहाँ कई यादें मेरे सामने खड़ी हो जाती है जिनमें से कुछ यादें माँ के साथ होती है तो कुछ पिताजी के साथ। सच बड़े ही प्यारे दिन थे वे-- जब पूरी दुनिया अपनी मुट्ठी में समाई रहती थी --नानी के घर जाती थी तब भग्गू सिंह के जहाज ( बोट )  से गंगा नदी पार् करती थी। जो की दो मंजिला हुआ करता था मेरे ख्याल से मै , मेरी छोटी बहन और छोटा भाई  जरूर रहता होगा माँ के साथ --आधे घंटे में हम उस पार से इस पार यानि बरारी जरूर आ जाते होंगे  जब हम जहाज पर चढ़ते  थे  तो मैं  माँ से हमेशा  जहाज के दूसरी मंज़िल पर जाने के लिए कहती थी और माँ मान जाती थी. कभी मना नहीं करती थी जबकि अधिकतर लोग नीचे ही रहते थे क्योंकि किनारा तुरंत ही आ जाता था।  वैसे भी गर्मियों में गंगा नदी की चौड़ाई कम हो जाती थी। अब जब दुनिया की समझ थोड़ी सी हुई है तो लगता है माँ कितनी अच्छी थी मेरी-- बिना किसी डांट डपट के हमें ऊपर बैठा लेती थी जबकि हमारे साथ सामान भी हुआ करता था और कई बार माँ के साथ पिताजी नहीं होते थे। मैं ऊपर जहाँ  बैठने के लिए कुर्सियां बनी  रहती थी उसपर बैठकर बहुत खुश होती  थी और मन ही मन गंगा नदी की  धार को देखकर सोचती थी कि अगर किसी वजह से जहाज डूब भी जाए तो हम तो बच ही जायेंगे और यही वजह थी की मै हमेशा ऊपर ही बैठती थी.आज जब उन बातों को याद करती हूँ तो  लगता है क़ि माँ कितनी अच्छी थी-- मेरी ख़ुशी की खातिर उन्हें हमेशा सामान को ऊपर ले जाना पड़ता था और लाना पड़ता था लेकिन  फिर भी --- ???? बचपन से ही नानी के घर जाने की वजह से इतनी बार गंगा नदी पार किया कि अथाह जल से डर  नहीं बल्कि दोस्ती हो गई है। पिताजी के साथ भी पाकुड़िया ( झारखण्ड) जाने के लिए भागलपुर आना पड़ता था जहाँ रात की गाडी पकड़नी होती थी --साथ में छोटा भाई भी रहता था --पलकें नींद 

से बोझिल रहती थी। पिताजी बड़े प्यार से बोलते थे -- आँखें खोलो बेटा ---गाड़ी आनेवाली है पर आँखें खुलती नहीं थी बहुत अफसोस होता था पर नींद आंखों में सवार हो जाती थी --ऐसी कई यादें बिन बुलाये आ जाती है --वो जगह अभी भी याद है --सब कुछ वैसा ही है  पर ---
इन्ही यादों में खोयी वेटिंग रूम में बैठी थी ११ मई को ट्रैन की प्रतीक्षा में कि अचानक पतिदेव ने नारियल का टुकड़ा बढ़ाया मेरी ओर --जिसे देखते ही मुझे एक झटका सा लगा।  नारियल मुझे बेहद पसंद है और बचपन में स्टेशन या बस स्टैंड पर आते ही आँखें नारियल के इस तिकोने टुकड़े को तलाशने लगती थी ---साथ में माँ हो या पिताजी हमें नारियल जरूर मिल जाता था जिसे खाते- खाते  मैं बहुत सारे सपने बुन  लेती थी।एकदम छोटे - छोटे टुकड़ों में खाती  थी ताकि बहुत देर तक खाती रहूं। नारियल खाना  और खिड़की से बाहर देखना --ऐसी कई आदतें थीं जिससे  मेरी दुनिया --मेरी मुट्ठी में कैद रहती थी --किसी से कोई मतलब नहीं। जो चाहिए वो पल में हाजिरहो जाता था। कोई बड़े सपने नहीं थे मेरे। आज भी नहीं हैं। जो मिलता है उसमे खुश रहती हूँ। बहरहाल पतिदेव की तहेदिल से शुक्रगुजार हुई नारियल देखकर पर दिल को जो अचानक धक्का लगा उससे आँखों पर तो असर पड़ना ही था। यादों से पीछा छुड़ाने के लिए कुछ करती इससे पहले ही पतिदेव ने कहा --पास में ही बुक स्टाल है जाकर कुछ किताबें खरीद लो --इससे जहाँ मेरे सुस्त पड़े कदमो की चाल  तेज हुई वहीँ मैं अतीत के गलियारे से भी मुक्त हो गई। मनपसंद किताबों को खरीदने के बाद दिल बड़ा हल्का हो  गया --तभी ट्रैन भी आ 
गई। लेकिन ---नारियल खाते खाते गला खुश्क पर आँखों की कोर गीली हो गई --सोचा अब क्या करूँ ---कैसे छुपाऊं ---अपनी गीली पलकों को , सोच ही रही थी की अचानक --एक सुखद संयोग से सामना हो गया -- मेरे 
सीट  पर मेरी  ही ससुराल के-- जो की रिश्ते में मेरे जेठ लगते हैं उनका बेटा सपरिवार  बैठा हुआ था मिल गया --जिन आँखों में आंसुओं ने अपना डेरा जमाना चाहा --वहां अब ख़ुशी का बसेरा था। सच में ----पल पल में रूप बदलने में माहिर है ये जिंदगी ---इसमें जीतते वही हैं ---जिसने इसके प्रत्येक पल को  दिल से अपनाया है। 

                                                      ब्लॉगर साथियों---बहुत दिनीं के बाद आज वापसी कर रही हूँ --कोशिश रहेगी की आपके ब्लॉग पर भी आऊं अगर नेट साथ देगा तो---


गुरुवार, 23 जुलाई 2015

पैंतीस साल बाद

१ मई २०१५ को.....  लगभग ....  पैंतीस साल बाद  बचपन की उन गलियों और  सहेलियों से मिलने गई थी जिनके  साथ बड़े सुखमय पल बिताये  थे मैंने झारखण्ड के पाकुडिया में । जहाँ  बचपन की यादों को याद कर खुश हो रही थी वहीँ एक अंजाना सा भय भी था कि  पता नहीं कोई मिलेगी या नहीं , कोई मुझे पहचानेगा या नहीं पर बड़ी सुखद अनुभूति हुई जब  सहेली मीरा का घर पूछने पर एक लड़का हमें  ख़ुशी ख़ुशी उसके घर ले गया ,,,वहाँ  मीरा की माँ जो  काफी वृद्ध हो चली थीं मिलीं। मैंने उनसे पूछा--- आंटी मुझे पहचाना आपने-- हाँ तुम डिप्टी साहब की बेटी निशा हो --बिना समय गंवाए उन्होंने जवाब दिया। एक पल को मैं अवाक रह गई क्योंकि बचपन की निशा और आज की निशा में काफी अंतर आ चुका है और सबसे बड़ी बात ये थी की इस बीच हमारा कोई संपर्क भी नहीं था।





(जगह वही है उम्र अलग है ---इतनी बारिश थी कि  अँधेरा सा छा गया था, उसी समय का ये फोटो  है ) 
 चूँकि मीरा का घर मेरे विद्यालय के पास था अतः जब भी मौका मिलता था मैं उसके घर चली  जाती थी। मीरा अपने माता पिता की इकलौती संतान है ,इकलौती बिटिया की सहेली पर ममत्व उड़ेलने में उन्होंने कभी कोताही नहीं बरती थी। ये बात  उन्होंने त्वरित गति से पहचान कर साबित कर दिया। उनकी ख़ुशी की कोई सीमा नहीं थी --मेरे पतिदेव के साथ साथ मेरी दो बहनें  उसके बच्चे एवं पति  भी साथ में थे और हमें उसी दिन वापस भी होना था। बहुत कम समय था मेरे पास --शाम के तीन बजे पहुंची मात्र दो घंटे में  बहुत लोगों से मिलना  था। मीरा के घर के पास ही मेरी बाई का भी घर था। बाई बहुत पहले गुजर गई थी पर उसकी बिटिया मिल गई -- उससे भी मैंने यही  पूछा कि --मुझे पहचाना ? हाँ --आप निशा दीदी हैं। कितनी ख़ुशी हुई इसका वर्णन करना कठिन है। मैं डरते डरते पाकुडिया गई थी की उस जाने पहचाने जगह में अगर अनजान बन जाउंगी तो शायद बचपन का अनमोल खजाना खो जायेगा मेरा लेकिन नहीं वो खजाना आज कई गुना बढ़ गया। 

                                        खैर समय कम था ब्लॉक जाना था जहाँ क़्वार्टर में पिताजी के साथ रहती थी --मन में एक डर  था कि  शायद मेरा वो घर नहीं मिले मुझे --ये डर सही साबित हुआ। क्योंकि उसे तोड़ कर नया रूप दे दिया गया था मैंने रास्ते में ये सोच लिया था की अगर मेरा वो घर टूट गया होगा तो खेतों के मेड़ों पर बैठ कर पुरानी यादों को जी लुंगी पर मैंने ये कई बार महसूस किया है की कुछ बातें हमारे नियंत्रण से परे  होती है। जब मैं वहां पहुंची तो घनघोर  बारिश होने लगी और बिजली भी चमकने लगी शायद मेरे साथ प्रकृति भी भावविभोर हो रही थी---उसे कुछ पल का साथ गवारा नहीं था सो --- मैंने मन ही मन उससे एक वादा कर लिया की मैं  फिर आऊँगी दो घंटे के लिए नहीं कम से कम दो दिन के लिए। मेरी दीदीमुनि जो मुझे बहुत प्रोत्साहित करती थीं उनसे और रामलाल जिसे  पिताजी  अपने बेटे जैसा मानते थे से भी भेट हुई पर मेरी सहेली मीरा से भेंट नहीं हो पाई वो अपने पति के पास भागलपुर गई थी। शाम ५ बजे के करीब लौट गई सुखद संतुष्टि के साथ। पतिदेव को तहेदिल से धन्यवाद देते हुए। मै तो हिम्मत हार  रही थी ये कहते हुए की पता नहीं वहां कोई मिलेगा या नहीं पर उन्होंने कहा कोई बात नहीं सोचना long drive पे जा रहे हैं। बहरहाल फोन नम्बर ले लिया था और दे दिया था। एक दिन मीरा का फोन आया --उसकी आवाज सुनकर दिल गदगद हो गया,मैंने कहा मीरा-- मुझे तो लगा था कि   तुम मुझे भूल गई होगी ? कैसे भूल सकती हूँ मैं तुम्हें निशा ? मैंने अपनी बेटी का नाम निशा रखा है --मुझे पता था की तुम मुझसे मिलने अवश्य आओगी।  हाँ --तुम्हारे प्यार की शक्ति ही तो मुझे खींच कर तुम्हारे पास ले गई थी --कहना  चाहकर भी  मैं नहीं कह पाई मीरा से --बस उसकी  बातें सुनती रही। आज जबकि  सम्पति के निवेश के नाम पर तथाकथित दोस्त नासूर बनकर अंतहीन और असीम दर्द की सौगात देने से नहीं चूकते  हैं और जरुरत न हो तो पैंतीस साल तो क्या पैंतीस मिनट भी बड़ी मुश्किल से याद रख पाते हैं --वहीँ मीरा जैसी सहेली कुदरत का करिश्मा बन कर मुझे खुशियो से सराबोर कर गई। शायद यही जिंदगी है। 


सोमवार, 29 सितंबर 2014

मधुर मुस्कान

सुबह के सवा नौ बज रहे होंगे। 
सिलिकॉन सिटी से भंवरकुँआ जाने के लिए निकल

रही थी। अकेली थी सो क़दमों की 
गति तेज थी कि अचानक पीछे से आवाज आई -आँटी कहाँ जा रही हैं ?आवाज की मधुरता से चिहुँक उठी -बिजली की गति से गर्दन घूमाया एक अनजान और अपरिचित ६-७ साल की बच्ची की आँखों में कौतुहल भरा प्रश्न देख कर बड़ा अच्छा लगा।  शायद वो मुझे पहचानती थी। मैं पढ़ने के लिए कॉलेज जा रही हूँ -तुम स्कूल जाती हो ? हाँ आंटी -मैं भी स्कूल जाती हूँ। बच्ची में गज़ब का आत्मविश्वास था। संभवतः वो पास में ही मकान बनाने वाले मजदूर की बच्ची थी और उसने मुझे मेरी बिटिया के साथ देखा होगा।  मैँ आगे बढ़ी पर दिल ने सरगोशी की ,कि  बच्ची ने पीछे से आवाज लगाकर रोक लिया पता नहीं बस मिलेगी या नहीं।  बचपन से ऐसी बातें सुनती आई हूँ। चार कदम आगे बढ़ी की बस जाते दिखी -दिल धक से रह गया -जा -आज तो छूट गई बस। रविवार था।  बिटिया और उसकी रूम मेट सो रही थी --शायद मैंने भी सन्डे मना  लिया था क्योंकि हमेशा सवा आठ तक घर से निकल जाती थी। खैर मुख्य सड़क तक आकर महू से आनेवाली ब्लू बस में बैठी पर ये क्या ? बस अभी दो किलोमीटर भी नहीं चल पाई की उसका पहिया पंक्चर हो गया। अब तो समय की सुई के साथ दिल की धड़कनें तेज़ हो रही थी क्योंकि साढ़े दस बजे तक शिक्षा संस्थान पहुंचना जरुरी था। साढ़े दस का मतलब साढ़े दस नहीं तो ? किस्मत से एक खाली ऑटो मिल गया और मैं  समय पर अपने स्थान तक पहुँच गई। आज भी कानों में  उस बच्ची की मधुर आवाज गूंजने के साथ हीं चेहरे पर मधुर मुस्कान फ़ैल जाती है पर  दिल में एक सवाल उमड़ने-घुमड़ने लगता है कि  लोग  महज एक संयोग को अन्धविश्वास का रूप दे देते हैं ----क्यों ?

रविवार, 13 अप्रैल 2014

धुँधली सी यादें


दो छोटे-छोटे बच्चों की  माँ  थीं वो---- चेहरे पे मुस्कान उनकी पहचान थी.सपनों से भरी उनकी आँखें हमेशा ही मुझे उनकी ओर आकर्षित करता था । काले- लम्बे बालों के बीच उनका चेहरा चाँद सा चमकता रहता था। उस पर उनका स्वभाव बहुत अच्छा था। बड़े प्यार से बातें करतीं थीं.…आंटी,,,,, धुँधली सी यादें हैं ---मैं शायद
कक्षा चतुर्थ में पढ़ती थी। ।मेरे ख्याल से  अंकल सरकारी डाक्टर थे। तभी उन्हें क़्वार्टर मिला था । वे भी देखने में बड़े सुन्दर थे ---सुंदरता के मामले में ऐसी जोड़ी मैंने शायद अभी तक नहीं देखा है। आंटी के घर के पास हीं मेरा स्कूल था। उनके दोनों बच्चे मुझसे घुल-मिल गए थे। मौका मिलते हीं  मैं  बच्चों से और आंटी मुझसे बात कर लेती थीं। बहुत अच्छा लगता था मुझे उनसे मिलकर।उम्र में मैं बहुत छोटी थी पर आंटी बहुत बातें शेयर करतीं थीं मुझसे। अचानक एक दिन आंटी ने बताया की अब उन्हें दो कमरे का  घर छोटा पड़ने लगा है --बच्चे बड़े हो रहे हैं। बड़ा क़्वार्टर नहीं मिलने की वजह से उन्हें कहीं किराए से मकान लेना होगा। उन्हें भी दुःख हो रहा था और मुझे भी --पर जाना तो था हीं । मेरा भी उस स्कूल में वो अंतिम साल था। छठी कक्षा में मेरा एडमिशन कन्या विद्यालय में करवाना था। जिससे अपनापन मिलता है उससे जुदाई हमेशा दुखदाई होती है --पर मिलना -बिछुड़ना प्रकृति का नियम है --ये बालपन में हीं समझ लिया था। किन्तु जिससे आप दिल से  जुड़े हुए रहते हैं --उससे मिलाने का प्रकृति भी भरपूर  प्रयास करती है -छठी कक्षा में एडमिशन के बाद जब मैं स्कूल जा रही थी तो जिस रस्ते से होकर मुझे जाना था उसी के पास में वो आंटी मुझे दिख गईं -दोनों खुश हो गए। बस उस दिन से आंटी स्कूल आते और जाते समय अधिकतर दिख हीं जाती थीं। मेरे ख्याल से आंटी अंतर्मुखी थीं क्योंकि उनकी दोस्ती नहीं थी किसी से ज्यादा। आते-जाते हम एक दूसरे से बात कर लेते थे। एक दिन अचानक आंटी का चेहरा देख मैं  घबरा गई। उनकी आँखें लाल-लाल हो रही थीं। मैंने पूछा -क्या हुआ आंटी --आप रोईं हैं क्या ?उन्होंने कहा--कल तुम्हारे अंकल को कुछ लोगों ने बहुत बहुत मारा है---हाथ से नहीं--लोहे की जंजीर से--क्यों मारा ? पूछने पर उन्होंने बताया की आदिवासी इलाके में जो शायद अंकल का ड्यूटी-स्थल था --लोगों ने अंकल को किसी आदिवासी औरत के साथ संदिग्ध अवस्था में देख लिया था कई बार उन्हेँ  धमकाया भी गया था पर उनकी बात नहीं मानने पर सभी लोग एक-जूट हो गए और अंकल को बुरी तरह से मारा। आज भी मार की उस काल्पनिक छवि से मैं अंदर से दहल जाती हूँ। अपने पति के शरीर पर पड़े लोहे के जंजीरों के निशाँ से आंटी को कितनी तकलीफ हुई होगी! जिस चेहरे पर हमेशा ख़ुशी देखी हो-- उस चेहरे पर आँसू देखना बड़ा कष्टदायक होता है। अंकल के लिए मुझे बिलकुल दुःख नहीं हुआ पर आंटी के लिए बड़ा दुःख हुआ। बात में कहीं -न कहीं दम होगा तभी उन लोगों ने ये कदम उठाया होगा क्योंकि जहाँ तक मेरा अवलोकन है आदिवासी   बड़े सच्चे और सीधे होते हैं..इतनी प्यारी बीवी और इतने प्यारे बच्चे के रहते अंकल के इस भटकाव से दिल में उनके लिए जहाँ नफ़रत की भावना ने जन्म लिया वहीँ उन आदिवासी की पीठ ठोकने  की इच्छा हुई। उस समय छोटी थी , उतनी समझ नहीं थी पर आज भी मेरे   विचार जस के तस हैं। भ्रष्टाचार और अराजकता के इस माहौल में कभी-कभी उन आदिवासियों की याद आती है। हो सकता है की किसी और वजह से उन्होंने अंकल की पिटाई की हो पर दिल उन आदिवासी को गलत मानने की गवाही नहीं देता। आज हमारे आसपास ऐसी  कई घटनाएं घट  रही है ,,अवैध सम्बन्ध फल-फूल रहे है। किसी की माँ-बहन और बेटी को जलील किया जा रहा है। । हम इन सबकी जिम्मेदारी शासन पर डालकर संतुष्ट हो रहे हैं। क्या  हमारा कर्तव्य नहीं है की हम उन पापियों को सबक सिखाएं  ? चाहे जिस रूप में  हो। लोग कहते हैं की हम दूसरों की फटी में टांग नहीं अड़ाते। गलत तर्क है ये। याद रखिये अगर आपके आसपास गलत लोग रह रहे हैं  तो कल को आपके घर में  बड़ी घटना घट  सकती है। इसलिए जागरूक रहिये और स्वथ्य समाज के निर्माण में अपनी भागीदारी निभाइए।  आपकी सतर्कता से अगर किसी की जान बचती है या किसी का घर तबाह होने से बचता है तो आपको  ख़ुशी मिलेगी। ये आपकी सबसे बड़ी उपलब्धि होगी।

शुक्रवार, 7 फ़रवरी 2014

माँ और मजबूरी







छोटे से बच्चे को क्रैच में छोड़ते समय माँ की आँखों में आँसूं  एवं दिल में दर्द था ----माँ छोड़कर जा रही है ये देख बच्चा  जार-बेजार रो रहा है पर माँ क्या करे उसे नौकरी भी करना है ताकि बच्चे का भविष्य सुरक्षित हो सके---
समय बदला-- वक्त ने करवट ली ---
 माँ  दरवाजे पर खड़ी है --उनकी आँखें आज भी भरी हैं  और दिल में दर्द भी है क्योंकि आज उनका बेटा पढ़लिख कर--- बड़ा आदमी ? बन गया है और बीवी के साथ ख़ुशी-ख़ुशी  अपने आशियाने की ओर  कदम बढ़ा रहा है। वक्त के साथ सिर्फ एक बात  नहीं बदली  ---माँ की आँखों में  आँसू और दिल में  दर्द---माँ बेटे के साथ जाना चाहती है पर नहीं जा सकती वो कल भी मजबूर थी और आज भी मजबूर है--कल उसकी  मजबूरी नौकरी थी और आज बेटे-बहू की  आज़ादी - सब कुछ बदल कर भी कुछ नहीं बदला  शायद इसे  हीं जीवन कहते हैं। माँ और मजबूरी का बड़ा गहरा नाता है। 
                                      

गुरुवार, 5 दिसंबर 2013

अवध एक्सप्रेस का लेडीज़ कम्पार्टमेंट

तत्काल सफ़र करना कितना मुश्किल काम है ये एक भुक्तभोगी  ही समझ सकता है। मैंने अभी ऐसी ही कई यात्रायें की  है। अवध एक्सप्रेस के लेडीज़ कम्पार्टमेंट में ---जहाँ कि औरतें कम और सामान ज्यादा रहता है। गाडी के सबसे पीछे वाली बोगी -सुरक्षा कि कोई व्यवस्था नहीं -किसी को खड़े होने कि जगह नहीं मिलती तो कोई रास्ते में ही लेटी या बैठी रहती है। एक औरत के साथ चार सामान --कोई देखनेवाला नहीं ,मुम्बई जानेवाली और मुम्बई से आनेवाली निम्न वर्ग की  महिलाओं से भरा रहता है कम्पार्टमेंट। शामगढ़ से लखनऊ तक एक बार भी कोई गार्ड नहीं आया। सभी औरतें इतनी बुरी तरह से लड़ती हैं कि उसका वर्णन करना भी मुश्किल है। भगवान की  दया से मुझे सीट मिल जाती है  पर जो डरपोक किस्म कि औरतें होती है उसे रास्ता भी नहीं मिल पाता। कितना कठिन  है ऐसी यात्रा को अंजाम देना और इसका जिम्मेदार कौन है ?  कई सवाल ऐसे हैं जिनका कोई जवाब नहीं है। पर मैं ऐसे सफ़र का भी भरपूर आनंद लेती हूँ। क्योंकि सफ़र तो सफ़र है चाहे वो दूरियों का सफ़र हो या जिंदगी का----- उसे कैसे जीना है ये अपने हाथ में है।