शुक्रवार, 22 जुलाई 2016

वो औरत


 उसकी दूसरी शादी थी। पहले पति से किसी कारणवश तलाक हो गया था। पढ़ी लिखी समझदार महिला थी। दूसरे पति की पत्नी का देहांत हो गया था किसी बीमारी  की वजह से, उनके दो बेटे हैं -शादी के वक्त एक बेटाबारहवीं एवम दूसरा नौवीं कक्षा में पढ़ते थे। एक नयी जिंदगी की शुरुआत बड़े ही उत्साह से किया उसने। घर का काम ,नौकरी ,सभी की आवश्यकता की पूर्ति उसकी प्राथमिकता थी। अपने पैसे से अपने बेटों को मनचाहा उपहार देती थी ,अपने लिए कुछ नहीं जोड़ा। शुरू में बड़े बेटे ने उसे दिल से स्वीकार नहीं किया था किन्तु बाद में सभी कुछ सामान्य हो गया था। समय को बीतने में समय नहीं लगता। बड़े बेटे की शादी की। सौत की कभी अपने ससुराल वालों से नहीं पटी  थी सो वो अलग रहती थी ,अपने पति और बच्चों के साथ लेकिन इसने अपने ससुराल वालों को पुनः जोड़ा। कुल मिलाकर वो एक सुखी जीवन जीने का सपना साकार करना चाहती थी लेकिन ऐसा नहीं हो सका। बहू के आ जाने के बाद वो सबकी नज़रों को चुभने लगी क्यों ? सबके अपने अपने कारण थे। बहू ने बताया रोटी फूर्ति से नहीं बना पाती हूँ तो मुझे परेशां करती है। बेटे ने बताया की सुबह थोड़ी देर हो जाती है उठने में तो --ये औरत दरवाजा खटखटातीहै ।खाने के लिए बैठते हैं हम तो पूछती है कितनी रोटी खाओगे। पति का कहना था बेवजह झगड़ती है। छोटे बेटे का उससे ज्यादा लगाव था वो अगर सौतेली माँ का पक्ष लेता था तो ऐसा कहा गया कि उसका --उस औरत से गलत सम्बन्ध है। इन सभी कारणों की वजह से आखिरकार सभी घर वालों ने निर्णय लिया की --पापा इस औरत को तलाक दे दे। रो रही थी  तो सिर्फ और सिर्फ वो औरत जिसने शायद दिल से सभी से रिश्ता  जोड़ा था किसी और ने नहीं जो  रिश्ता तोड़ने के लिए लचर दलील का सहारा ले रहे थे। बड़े बेटे और बहू किसी भी शर्त पर उसे अपने घर में जगह देने को तैयार नहीं थे। छोटा गुमसुम था। 
                                                 उस औरत ने बताया कि मेरे पति को मेरे चरित्र पर शंका है --उन्हें लगता है कि --मेरा उनके किसी दोस्त से अवैध सम्बन्ध है। पति से पूछने पर बड़े बेटे ने जबाव दिया कि -ये औरत मेरे पापा के दोस्तों को पैग बनाकर देती है ,सभी के साथ हँसती बोलती है। कुल मिलाकर ये बात सामने आई कि -वे लोग ऐन -केन प्रकारेण उससे छुटकारा पाना चाहते थे. बड़े बेटे के पास इस बात का कोई जवाब नहीं था कि उसके पापा ऐसे लोगों को घर ही  क्यों बुलाते थे जिनके चालचलन का कोई भरोसा नहीं था। जितने दिन आवश्यकता थी , उस औरत की उन लोगों ने उसकी सहायता ले ली। बहू के आने के बाद वो सभी के नज़रों की किरकिरी बन गई। उससे छुटकारा पाने के लिए --बहू -बेटे प्लानिंग कर उसे गुस्सा दिलाते रहे और वो औरत उस के साजिश की शिकार होती रही। एक दिन गुस्से से ससुराल से मायके आ गई। बड़े बेटे और बहू को मौका मिल गया। दुबारा उसे अपने घर में घुसने नहीं दिया। वो औरत रोती रही कि मुझे दुबारा अपना घर नहीं तोडना है --पर कौन सा घर ? किसका घर ? छोटे बेटे का एक बार को दिल पसीजा भी लेकिन अन्य लोगों पर कोई 
प्रभाव नहीं पड़ा। उस औरत के जिंदगी में घटनेवाली इस घटना की जानकारी जब उसके किसी परिचित और उम्रदराज महिला ने सुनी तो उसने अफसोस जताते हुए सिर्फ इतना ही कहा --उसके पति के मित्र मण्डली को देखते ही मैं  समझ गई थी कि --इसने  गलत निर्णय ले लिया है। इसके पास अच्छे अच्छे विधुर के तरफ से रिश्ते आये थे जिसके बच्चे बहुत छोटे थे जो न सिर्फ उसे माँ का दर्जा  देते बल्कि पति भी अहसानमंद होते ---लेकिन उसने किसी की बात नहीं मानी। काश--- की 
वो समय रहते ही ---समय और सम्बन्ध दोनों के नब्ज को पहचान लेती --तो  दुःख के इस भंवर में न डूबती --पर कोई क्या कर सकता है। ..हम सोचते क्या हैं और हो क्या जाता है ---शायद यही जिंदगी है। 





4 टिप्‍पणियां: