रविवार, 13 अप्रैल 2014

धुँधली सी यादें


दो छोटे-छोटे बच्चों की  माँ  थीं वो---- चेहरे पे मुस्कान उनकी पहचान थी.सपनों से भरी उनकी आँखें हमेशा ही मुझे उनकी ओर आकर्षित करता था । काले- लम्बे बालों के बीच उनका चेहरा चाँद सा चमकता रहता था। उस पर उनका स्वभाव बहुत अच्छा था। बड़े प्यार से बातें करतीं थीं.…आंटी,,,,, धुँधली सी यादें हैं ---मैं शायद
कक्षा चतुर्थ में पढ़ती थी। ।मेरे ख्याल से  अंकल सरकारी डाक्टर थे। तभी उन्हें क़्वार्टर मिला था । वे भी देखने में बड़े सुन्दर थे ---सुंदरता के मामले में ऐसी जोड़ी मैंने शायद अभी तक नहीं देखा है। आंटी के घर के पास हीं मेरा स्कूल था। उनके दोनों बच्चे मुझसे घुल-मिल गए थे। मौका मिलते हीं  मैं  बच्चों से और आंटी मुझसे बात कर लेती थीं। बहुत अच्छा लगता था मुझे उनसे मिलकर।उम्र में मैं बहुत छोटी थी पर आंटी बहुत बातें शेयर करतीं थीं मुझसे। अचानक एक दिन आंटी ने बताया की अब उन्हें दो कमरे का  घर छोटा पड़ने लगा है --बच्चे बड़े हो रहे हैं। बड़ा क़्वार्टर नहीं मिलने की वजह से उन्हें कहीं किराए से मकान लेना होगा। उन्हें भी दुःख हो रहा था और मुझे भी --पर जाना तो था हीं । मेरा भी उस स्कूल में वो अंतिम साल था। छठी कक्षा में मेरा एडमिशन कन्या विद्यालय में करवाना था। जिससे अपनापन मिलता है उससे जुदाई हमेशा दुखदाई होती है --पर मिलना -बिछुड़ना प्रकृति का नियम है --ये बालपन में हीं समझ लिया था। किन्तु जिससे आप दिल से  जुड़े हुए रहते हैं --उससे मिलाने का प्रकृति भी भरपूर  प्रयास करती है -छठी कक्षा में एडमिशन के बाद जब मैं स्कूल जा रही थी तो जिस रस्ते से होकर मुझे जाना था उसी के पास में वो आंटी मुझे दिख गईं -दोनों खुश हो गए। बस उस दिन से आंटी स्कूल आते और जाते समय अधिकतर दिख हीं जाती थीं। मेरे ख्याल से आंटी अंतर्मुखी थीं क्योंकि उनकी दोस्ती नहीं थी किसी से ज्यादा। आते-जाते हम एक दूसरे से बात कर लेते थे। एक दिन अचानक आंटी का चेहरा देख मैं  घबरा गई। उनकी आँखें लाल-लाल हो रही थीं। मैंने पूछा -क्या हुआ आंटी --आप रोईं हैं क्या ?उन्होंने कहा--कल तुम्हारे अंकल को कुछ लोगों ने बहुत बहुत मारा है---हाथ से नहीं--लोहे की जंजीर से--क्यों मारा ? पूछने पर उन्होंने बताया की आदिवासी इलाके में जो शायद अंकल का ड्यूटी-स्थल था --लोगों ने अंकल को किसी आदिवासी औरत के साथ संदिग्ध अवस्था में देख लिया था कई बार उन्हेँ  धमकाया भी गया था पर उनकी बात नहीं मानने पर सभी लोग एक-जूट हो गए और अंकल को बुरी तरह से मारा। आज भी मार की उस काल्पनिक छवि से मैं अंदर से दहल जाती हूँ। अपने पति के शरीर पर पड़े लोहे के जंजीरों के निशाँ से आंटी को कितनी तकलीफ हुई होगी! जिस चेहरे पर हमेशा ख़ुशी देखी हो-- उस चेहरे पर आँसू देखना बड़ा कष्टदायक होता है। अंकल के लिए मुझे बिलकुल दुःख नहीं हुआ पर आंटी के लिए बड़ा दुःख हुआ। बात में कहीं -न कहीं दम होगा तभी उन लोगों ने ये कदम उठाया होगा क्योंकि जहाँ तक मेरा अवलोकन है आदिवासी   बड़े सच्चे और सीधे होते हैं..इतनी प्यारी बीवी और इतने प्यारे बच्चे के रहते अंकल के इस भटकाव से दिल में उनके लिए जहाँ नफ़रत की भावना ने जन्म लिया वहीँ उन आदिवासी की पीठ ठोकने  की इच्छा हुई। उस समय छोटी थी , उतनी समझ नहीं थी पर आज भी मेरे   विचार जस के तस हैं। भ्रष्टाचार और अराजकता के इस माहौल में कभी-कभी उन आदिवासियों की याद आती है। हो सकता है की किसी और वजह से उन्होंने अंकल की पिटाई की हो पर दिल उन आदिवासी को गलत मानने की गवाही नहीं देता। आज हमारे आसपास ऐसी  कई घटनाएं घट  रही है ,,अवैध सम्बन्ध फल-फूल रहे है। किसी की माँ-बहन और बेटी को जलील किया जा रहा है। । हम इन सबकी जिम्मेदारी शासन पर डालकर संतुष्ट हो रहे हैं। क्या  हमारा कर्तव्य नहीं है की हम उन पापियों को सबक सिखाएं  ? चाहे जिस रूप में  हो। लोग कहते हैं की हम दूसरों की फटी में टांग नहीं अड़ाते। गलत तर्क है ये। याद रखिये अगर आपके आसपास गलत लोग रह रहे हैं  तो कल को आपके घर में  बड़ी घटना घट  सकती है। इसलिए जागरूक रहिये और स्वथ्य समाज के निर्माण में अपनी भागीदारी निभाइए।  आपकी सतर्कता से अगर किसी की जान बचती है या किसी का घर तबाह होने से बचता है तो आपको  ख़ुशी मिलेगी। ये आपकी सबसे बड़ी उपलब्धि होगी।

15 टिप्‍पणियां:

  1. सही कहा आपने... अपने परिवेश के प्रति उदासीनता अपराध है. सतर्कता और पारिवारिक मूल्य ही इलाज़ हैं.

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  2. प्रोत्साहन के लिए बहुत-बहुत धन्यवाद सर .....

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  3. अच्छी बात है । आज जहाँ सबको अपने अपने से मतलब रह गया है कोई समाज और सामाजिक मूल्यों की बात भी करता है तो अच्छा लगता है ।

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  4. बिल्कुल सच कहा है...हमें अपने आस पास की घटनाओं से निस्पृह नहीं होना चाहिए..

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  5. सुन्दर भाव प्रबंध बढ़िया रचना

    सशक्त सन्देश संस्मरण की मार्फ़त -जैसा बोवोगे वैसा काटोगे करतम सो भोक्तम्

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  6. शुक्रिया आपकी प्रेरक टिप्पणी का ,शुक्रिया आपकी प्रेरक टिप्पणी का ,विश्लेषण परक बढ़िया संस्मरण पढ़वाया आपने।

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  7. लगता है नन्ही निशा से आपबीती सुन रहा था अब तक ! मंगलकामनाएं स्वीकार करें ……

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  8. अर्थपूर्ण रचना के लिए साधुवाद

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  9. लोग कहते हैं की हम दूसरों की फटी में टांग नहीं अड़ाते। गलत तर्क है ये। याद रखिये अगर आपके आसपास गलत लोग रह रहे हैं तो कल को आपके घर में बड़ी घटना घट सकती है। इसलिए जागरूक रहिये और स्वथ्य समाज के निर्माण में अपनी भागीदारी निभाइए। आपकी सतर्कता से अगर किसी की जान बचती है या किसी का घर तबाह होने से बचता है तो आपको ख़ुशी मिलेगी। ये आपकी सबसे बड़ी उपलब्धि होगी।

    बिलकुल सही कहा आपने... यही सबको करना चाहिए। हमारे थोड़े प्रयास से यदि किसी का भी भला होता है तो उससे बड़ी बड़ी ख़ुशी और कुछ नहीं ।

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