बुधवार, 18 सितंबर 2013

बहन के लिए इतनी नफरत ?


                                                                                             छोटी बेटी से मिलने जा रही थी एक माँ। बड़ी बेटी के पास रहती थी क्योंकि                 
                                                                     विधवा थी,दो बेटियाँ हीं थी।
 बड़ी बेटी का पति इंजीनियर है और उसके दो बच्चे हैं --एक बेटा जो अभी   पढाई कर रहा है दिल्ली में और एक बेटी जो कोलकाता में नौकरी कर रही है। इसी साल मई में उसकी शादी हुई है। बड़ा दामाद बहुत पैसेवाला है क्योंकि चार जिले का निर्माण कार्य उसके अधीन रहता है। विधवा के पति की कैंसर से मौत हो गई। वो भी उच्च पदस्थ  व्यक्ति थे। पेंशनधारी थे। अपने जीते जी अपनी सम्पति का बँटवारा करके गए थे दोनों बेटियों के नाम। विधवा के पास अभी भी खेती के रूप में काफी संपत्ति है और पेंशन भी मिलता है। खेती का खर्च वो खुद करती है पर उपज बड़ी बेटी हीं लेती है क्योंकि छोटी बेटी घर ( बिहार-भागलपुर ) से दूर राजस्थान के चितोड़ में रहती है। बड़ी बेटी की बेटी की शादी हुई पर उस औरत की बेटी यानी दुल्हन की मौसी  उसमें शरीक नहीं हुई क्योंकि कुछ दिन पहले  वो एक बिटिया की माँ बनी थी। छोटा दामाद भी कृषि विभाग में उच्च पद पर है -बेटी भी पढ़ी लिखी है पर बच्चे छोटे होने की वजह से नौकरी नहीं कर पा रही है।

 नातिन की शादी की वजह से छोटी बेटी के पास नहीं जा पाई थी। चूँकि अब सारा काम निबट गया था। अतः वो अपनी नवजात नातिन से मिलने जा रही थी। साथ में बड़ी बेटी का भांजा था जो उसे रह-रह कर कुछ बातें समझा रहा था। महिला की उम्र यही कोई साठ साल के करीब होगी । मै १४.७ . १३ को भागलपुर -अजमेर से चंदेरिया आ रही थी ,वो महिला मेरी सहयात्री थी। धीरे-धीरे परिचय बढ़ा और दुकड़ों-दुकड़ों में उसने अपनी आप बीती सुनाई । साथ में जो लड़का था वो आक्रोशित होकर बता रहा था -मेरी मामी बहुत ख़राब है, वो बहुत लोभी है अपनी माँ से अच्छा व्यवहार  नहीं करती ,अपनी बहन को तो देखना हीं नहीं चाहती। सगी बहन को अपनी बेटी की शादी में नहीं बुलाया। मैंने जब उस महिला से पूछा तो उनका जवाब मिला कि छोटी बेटी को उसी समय डिलीवरी हुई थी इसीलिए वो नहीं आ पाई पर उनकी आँखों में दुःख और लाचारी साफ झलक रही थी। 


                                                    वास्तविकता ये थी कि बड़ी बेटी ने चाल  चलकर अपनी बेटी की शादी का समय ही वही लिया और शादी के नाम पर अपनी माँ को छोटी बहन के पास नहीं जाने दिया। साथ वाला लड़का उनकी हर बात का जवाब दे रहा था। उनको समझा रहा था --मेरी मामी के पास साल भर मत रहिये। ६ महीने छोटी के पास और ६ महीने बड़ी के पास रहिये। वो आप से नहीं आपके पैसों से प्यार करते हैं। मुझे सुनाते हुए कहा -आंटी ! मामी ने नानी को आम भी नहीं खरीदने दिया जबकि अभी कुछ दिन पहले अपनी बेटी को आम देकर आई है कोलकत्ता से। नानी ने आम खरीदने केलिए कहा तो उन्होंने कहा कि गर्मी बहुत है --आम  ख़राब हो जाएगा। …आप बताइए  ए.सी. में एक दिन में आम कैसे ख़राब होगा जबकि मौसी ने कई बार फोन करके नानी को आम लेने  के लिए कहा था पर मामी ने साफ मना कर दिया। मेरे पूछने पर उस महिला ने बताया की मेरी बड़ी बेटी और छोटी बेटी में १८ साल का अंतर है। बड़ी बेटी ने छोटी को आज तक दिल से नहीं अपनाया। मरने से पहले मेरे पति ने कहा था बड़ी बेटी की हर बात मानना। बहुत ही सरल ह्रदय की महिला थी वो मैंने उन्हें कहा की आपके पति ने उसकी गलत बात मानने के लिए थोड़े कहा था अगर आप हिम्मत करके आम खरीद लेतीं तो वो कुछ नहीं कर पातीं ,ऐसे तो आप उसे बढ़ावा दे रही हैं।

 आपको बड़ी बेटी के ऐसे व्यवहार का विरोध करना चाहिए। इतने में उनकी छोटी बेटी का फोन आ गया। वो मम्मी से पूछ रही थी --कि मम्मी आपके  पास ज्यादा सामान तो नहीं है। नहीं बेटा --सिर्फ एक बैग है जिसमें मेरा सामान है। फोन रखने के बाद उनकी उदासी देख मुझे बड़ा दुःख हो रहा था --मेरे पास ५० आम थे जो  मेरे पति और बेटे के लिए लेकर आ रही थी। बेटी साथ थी। हम दोनों माँ-बेटी ने आम खा हीं लिया था। वस्तुतः बिहार का मालदह ( लंगड़ा आम )आम खाने में बहुत स्वादिष्ट होता है।    मुझे भी मेरी बेटी और पतिदेव के दोस्त मना कर रहे थे पर मेरे पास दो घंटे थे उस समय का उपयोग कर भागलपुर से ही मैं आम खरीद कर उसे पैक करा कर ले आई थी। माँ हूँ ---माँ का दुःख समझ में आ रहा था। साथ में मेरी बिटिया भी थी। हमने आपस में बात किया और ---अपनी सहयात्री से कहा कि आंटी मेरे पास आम है आप दुखी मत होइये अपनी बेटी के लिए कुछ आम ले जाइये। वो कुछ बोलती उनके पहले ही उनके साथ वाला लड़का घबरा कर बोल उठा नहीं मेरी मामी को पता चलेगा तो वो मेरी नानी के साथ मेरी हालत भी ख़राब कर देंगी। मैंने कहा --उन्हें कैसे पता चलेगा ? तो उसने बताया की मौसी  एक सात साल का बेटा भी है वो बता देगा। वो औरत कभी मुझे देख रही थी तो कभी साथ वाले लड़के को। अंत में दुखी होकर बोली मेरे दामाद होते तो वो जरुर भेजते  चूरा और आम मेरी बेटी के लिए। मेरी बेटी मेरा  दर्द नहीं समझती पर मेरे दामाद को सब कुछ समझ में आता है। मुझे मालूम है मेरी छोटी बेटी मेरे सामान के बारे में इसीलिए पूछ रही थी 
वो सिर्फ यही पता लगाना चाह रही थी कि मै आम ला  रही हूँ या नहीं। मेरे  नाती ने भी कई बार मुझसे कहा था की नानी आम जरुर लाना। साथ वाला लड़का उन्हें बार-बार समझा रहा था---कि मामी से डरा मत करो आपके पास अपना पैसा है ,उसे अपने हिसाब से खर्च कर सकती हैं आप। मैंने फिर उनसे आग्रह किया आप संकोच मत कीजिये। आम ले लीजिये मुझसे पर आख़िरकार में डर  की जीत हुई आम तो नहीं लिया उन्होंने लेकिन मुझसे वादा किया की आगे से बेटी के इस तरह के व्यवहार का विरोध करेगी। 
                                                                                         
                                                                             कहते हैं कि बेटी माँ के दिल का दर्द समझती है पर कैसी बेटी थी वो जो माँ का दर्द समझने के बजाय उनके दर्द को बढ़ा रही थी। अपनी बेटी को खुद जाकर आम पहुँचा आई और बहन के लिए इतनी नफरत ? छोटे बच्चे हो तो उसका व्यवहार क्षम्य है पर इस उम्र में ऐसा अपरिपक्व व्यवहार ?  माँ  और बहन को दुखी कर क्या वो खुश रह पाएगी ? शायद नहीं-- कभी न कभी किसी न किसी रूप में उसे इसकी भरपाई अवश्य करनी पड़ेगी। पर ईर्ष्या और नफरत की आग में इंसान सब कुछ भूल जाता है। जब तक बात समझ में आये  तब तक बहुत देर हो जाती है.  शायद यही जीवन है। 

8 टिप्‍पणियां:

  1. गहन तदानुभूति करवाती है यह रचना।

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  2. बिछोड़े को उद्दीप्त करती रचना -

    आवन कह गए अजहूँ न आये ,

    बीती जाए रे सारी उमरिया ,

    न लीन्हीं रे मोरी खबरिया।

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  3. बिछोड़े को उद्दीप्त करती रचना -

    आवन कह गए अजहूँ न आये ,

    बीती जाए रे सारी उमरिया ,

    न लीन्हीं रे मोरी खबरिया।

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  4. यही अज्ञान तेरे मेरे का भेदभाव माया है।

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  5. ऐसे लोग अभागे होते हैं , पूरा जीवन मेरा मेरा में गुज़र जाता है और अंत में मेरा ही नहीं होता !!

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  6. मां के लिए सब बच्चे एक सामान हैं

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  7. हाँ ...आज के परिवेश में बेटियों में भी स्वार्थ ने घर कर लिया है .या शायद पहले ससुराल में सबके साथ रहने के कारण माता-पिता से केवल मायके में ...वो भी बहुत कम समय के लिए मिलना हो पाता था इसलिए बेटी को स्वार्थ का रोग नहीं लग पाया था . अब तो उसकी नज़र जायदाद पर भी रहती है ....जहाँ भाई भी हों वहाँ तो स्थिति और भी पेचीदा है ....कर्तव्य सारे भाई के और जायदाद का हिस्सा करने की बात पर सब बराबर होते है ....शायद मानव का स्वभाव ही स्वार्थी है

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