बुधवार, 3 अप्रैल 2013

कैसे जी लेते हैं लोग

बड़े प्यार से माँ बहू  लेकर आई बेटे के लिए .....
.पर बहू  को सास की बंदिशे
पसंद नहीं आई .....पढ़ी लिखी बहू  थी ...
अपना बुरा भला सोच सकती थी .  इसलिए शादी की  सालगिरह भी नहीं मना सकी मात्र बारह दिन पति के साथ रही और अपना फैसला सुना दिया ....


कि,.... मैं अपने पति के साथ नहीं रह सकती .....
पति को मुक्त करने के एवज में अच्छी-खासी रकम
की मांग की ..पति गिडगिडाता रहा ..बस एक मौका दे दो ...

.
तुम्हारी सारी  शिकायतें दूर कर दूंगा ..पर पत्नी नहीं मानी ...
शायद उसे पति की नहीं पैसे की जरुरत थी ..बंधन उसे बोझ
लगा ....वो उन्मुक्त होकर जीना चाहती थी .....

उसने रिश्तों के महत्व को नहीं समझा बल्कि रिश्तों की कीमत लगाईं ..अपने कुत्सित इरादों की आड़ में  किसी के जीवन को दाँव पर लगाना ......कहाँ तक उचित है ?......गलती करनेवाले की आत्मा

क्या उसे धिक्कारती नहीं ? रिश्ता टूटने  की पीड़ा में पति की आँखों में आँसू थे,.....  दूसरों को दुःख देकर,...कैसे जी लेते हैं लोग .?

5 टिप्‍पणियां:

  1. दुनिया भरी पड़ी है ऐसे लोंगों से निशा जी....
    अपना मन हम कहाँ तक दुखाएं...
    :-(
    अनु

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  2. sacchi bat kahi aapne anu jee .......kanun ke sadupyog ke bjaay aajkal iska durupyog jyaada ho raha hai .....samaj bahut hi nigative diaha ki or ja raha hai ....

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  3. समझ अपनी-अपनी, दुनिया अजीब है, लोग भी!

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  4. तकलीफ देने में लोग आनंद लेते हैं डॉ निशा !
    शुभकामनायें !

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  5. risto ki kadr nhi rhi, bas paiso ki kadr baki h,bahut accha marmik vishay chuna hai, shubhkamnaye

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